ग्राम पंचायत कुरदा चांपा में नल जल योजना से वंचित ग्रामीण : जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की उदासीनता से उपजा संकट छत्तीसगढ़ राज्य के जांजगीर-चांपा जिले की ग्राम पंचायत कुरदा चांपा में केंद्र एवं राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी नल-जल योजना से ग्रामीणों को आज भी अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। सरकार द्वारा इस योजना की शुरुआत ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई थी, लेकिन वास्तविकता इससे  बिल्कुल विपरीत है। कुरदा चांपा पंचायत में योजना का संचालन तो कागजों पर हो रहा है,परंतु ज़मीनी स्तर पर ग्रामीण आज भी साफ़ पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

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गांव के अनेक मोहल्लों में न तो नलों से पानी आ रहा है और न ही समय पर टैंकर की व्यवस्था की जा रही है। जिन स्थानों पर पाइपलाइन बिछाई गई है,वहाँ भी या तो पाइपें खराब हो चुकी हैं या फिर उनमें पानी नहीं आ रहा है। कई घरों में नल कनेक्शन ही नहीं दिया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार सरपंच एवं पंचायत सचिव से इसकी शिकायत की,लेकिन हर बार उन्हें आश्वासन देकर टाल दिया गया। जनप्रतिनिधियों की लापरवाही इस स्थिति के लिए सबसे बड़ा कारण ग्राम पंचायत के जनप्रतिनिधियों और सचिव की उदासीनता है। पंचायत सचिव नारायण सिंह पिछले एक महीने से गायब है। ग्रामीणों के अनुसार वह कार्यालय नहीं आता और फोन करने पर भी कॉल रिसीव नहीं करता। सचिव की इस गैरहाज़िरी से पंचायत के सभी जरूरी कार्य ठप पड़े हुए हैं। जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र से लेकर मजदूरी भुगतान और मनरेगा से जुड़ी अन्य गतिविधियाँ भी प्रभावित हो रही हैं। पंचायत सचिव की जवाबदेही तय करने के लिए उच्च अधिकारियों को सूचित किया गया है,लेकिन अब तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं की गई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि जिला प्रशासन की ओर से भी गंभीरता की कमी है। शासन-प्रशासन की उदासीनता राज्य सरकार द्वारा करोड़ों रुपये की लागत से चलाई जा रही नल जल योजना के क्रियान्वयन में प्रशासन की उदासीनता भी प्रमुख कारण है। योजना में सामग्री की खरीदी,निर्माण कार्य और पाइपलाइन बिछाने जैसे कार्यों में अनियमितता की शिकायतें आम हैं। ग्राम पंचायत स्तर पर गुणवत्ता की जांच करने वाला कोई तंत्र सक्रिय नहीं है, जिसके कारण भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि जनप्रतिनिधि और अधिकारी केवल औपचारिकता निभाते हैं,जबकि गांव के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। गर्मी के इस मौसम में जब पानी की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, तब नलों से एक बूंद पानी नहीं निकलना शासन की नाकामी को दर्शाता है। ग्रामीणों की पीड़ा और अपेक्षा गांव की महिलाओं और बुजुर्गों को रोजाना कई किलोमीटर दूर जाकर कुएं या हैंडपंप से पानी लाना पड़ता है। इससे उनका कीमती समय और श्रम दोनों बर्बाद हो रहा है। बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ रहा है और स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, क्योंकि दूषित जल पीने से जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासन और जनप्रतिनिधि समय रहते सक्रियता नहीं दिखाते हैं,तो वे बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। उनका यह भी कहना है कि योजना का लाभ उन्हें तभी मिलेगा जब ईमानदारी से कार्य किया जाए और जवाबदेही तय की जाए। समाधान की राह इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए आवश्यक है कि पंचायत सचिव नारायण सिंह को तत्काल कार्य पर उपस्थित रहने का निर्देश दिया जाए ओर उनकी ज़िम्मेदारी को निर्वहन करें।और योजना की प्रगति की समीक्षा के लिए एक स्वतंत्र जांच समिति गठित की जाए,जो पाइपलाइन, कनेक्शन और जल आपूर्ति की वस्तुस्थिति की रिपोर्ट तैयार करे। साथ ही,जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली की भी जांच की जाए और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाए। सरकार की योजनाएं तभी सफल हो सकती हैं जब उन्हें ज़मीन पर सही तरीके से लागू किया जाए। कुरदा चांपा जैसे गांवों में व्याप्त पेयजल संकट केवल एक स्थानीय समस्या नहीं है, बल्कि यह शासन की जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। जब तक नीति और नीयत दोनों में सुधार नहीं होगा, तब तक ग्रामीणों को राहत नहीं मिल पाएगी।ग्रामीणों की मांग स्पष्ट है – उन्हें नल जल योजना का वांछित लाभ चाहिए, न कि केवल आश्वासन। पंचायत सचिव की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए,और प्रशासनिक उदासीनता पर सख्ती से लगाम लगाई जाए। यही इस समस्या का एकमात्र समाधान है।। S.mathur...